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एनडीए सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों में मज़दूर-विरोधी संशोधन के खिलाफ एक हों!

एनडीए सरकार द्वारा ‘मेक इन इण्डिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘डिजिटल इण्डिया’ और ‘व्यापार की सहूलियत’ जैसे कार्यक्रमों का डंका बजाते हुए श्रम कानूनों में संशोधन किये जा रहे हैं | श्रम मंत्रालय द्वारा 43 श्रम कानूनों को 4 बड़े कानूनों में समेकित किया जा रहा है | इसी कड़ी में 10 अगस्त 2017 को लोक सभा में ‘कोड ऑफ़ वेजिस बिल, 2017’ पेश किया गया | प्रत्यक्ष रूप से इस बिल का उद्देश्य वेतन सम्बन्धी निम्न चार केंद्रीय श्रम कानूनों के प्रासंगिक प्रावधानों का एकीकरण व सरलीकरण करना है (१) पेमेंट ऑफ़ वेजिस एक्ट, 1936, (२) मिनिमम वेजिस एक्ट, 1948, (३) पेमेंट ऑफ़ बोनस एक्ट, 1965, (४) इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट, 1976 | गौरतलब है की प्रस्तावित संशोधन मज़दूर विरोधी हैं और मालिकों/प्रबंधन के मुकाबले उनकी स्थिति को मज़बूती देने की जगह और कमज़ोर कर देते हैं | इसका विश्लेषण निम्नलिखित है |

रोज़गार सूची – इस कोड में एम्प्लॉयमेंट शेडूल को हटा दिया गया है जो श्रमिकों को कुशल, अर्ध कुशल और अकुशल की श्रेणी में बाँटती थी | ये नियम उन मजदूरों के लिए तो उपयोगी है जो लोग एम्प्लॉयमेंट शेडूल में नहीं है जैसे घरेलू मजदूर (13 राज्यों को छोड़कर घरेलू मजदूर शेड्यूल में नहीं आते इसलिए न्यूनतम मजदूरी दरें उन पर लागू नहीं होती) | परन्तु इसका दुष्प्रभाव कुशल और अर्ध-कुशल मजदूरों पर होगा जो मालिक से अधिक वेतन प्राप्त करने योग्य हैं |

मजदूरी तय करने के मापदंड - प्रस्तुत कोड में न्यूनतम मजदूरी की दर समयानुसार (टाईम वर्क) और मात्रानुसार (पीस वर्क) तय होगी और वेतनकाल घंटे, दिन या महीने के हिसाब से हो सकता है | मजदूरी तय करने के लिए सरकार काम के लिए आवश्यक कौशल, कठिनाई, कार्यस्थल की दूरी और अन्य उपयुक्त पहलू ध्यान में रख सकती है | यह नियम खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के न्यूनतम मजदूरी सम्बन्धी फैसलों की धज्जियां उड़ाता है | सुप्रीम कोर्ट ने यह कई बार दोहराया है कि न्यूनतम मजदूरी मजदूर की सभी आवश्यकताओं के हिसाब से तय होनी चाहिए | न केवल उसकी साधारण शारीरिक ज़रूरतों के आधार पर और न ही उत्पादन के आधार पर | इसके अनुसार न्यूनतम मजदूरी तय करते समय आहार-पोषण, पहनने-रहने, इलाज का खर्च, पारिवारिक खर्च, शिक्षा, ईर्धन, बिजली, त्योहारों और समारहों के खर्च, बुढ़ापे और अन्य खर्चों का ध्यान रखा जाना चाहिए | 1992 के मजदूर प्रतिनिधि सचिव बनाम रेप्ताकोस ब्रैट प्रबंधन केस में सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम मजदूरी के लिए निम्न 6 मापदंड तय किये थे – (१) एक मजदूर को 3 व्यक्तियों के उपभोग का पैसा मिले, (२) एक औसत भारतीय व्यस्क के लिए न्यूनतम आहार आवश्यकता 2700 कैलोरी, (३) हर परिवार के लिए सालाना 72 यार्ड्स कपड़ा, (४) सरकारी औद्योगिक आवास योजना के अंतर्गत प्रदान किये गए न्यूनतम क्षेत्र का किराया, (५) न्यूनतम मजदूरी का 20% ईर्धन, बिजली और अन्य खर्चों के लिए, (६) कुल न्यूनतम मजदूरी में 25% बच्चों, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन (त्योहार, समारोह आदि), बुढ़ापे, शादी आदि के लिए | बिल में इन सब मापदंडो को ख़त्म करने का प्रयास है | हालांकि कोड के अनुच्छेद 7 (2) के अनुसार राज्यों को जीवनयापन में होने वाले खर्चे के हिसाब से समय-समय पर वेतन निश्चित करने का प्रावधान है लेकिन यह बहुत ही अस्पष्ट है और यहाँ तक कि अनिवार्य भी नहीं है |

काम करने के घंटे और ओवरटाइम - प्रस्तुत कोड के अनुच्छेद 13 के अनुसार सरकार यह तय कर सकती है की एक आम दिन में कुल कितने घंटे काम होगा | लेकिन सरकार निम्न कर्मचारियों के लिए इस नियम को ताक पर भी रख सकती है -

  1. वे कर्मचारी जिन्हें किसी आपातकालीन काम में लगाया गया है जिसका पहले से अंदेशा न हो
  2. वे कर्मचारी जिनसे कोई ऐसा काम लिया जा रहा है जो मुख्य काम का पूरक है और आम कामकाज के दौरान नहीं हो सकता
  3. वे कर्मचारी जिनका रोजगार अनिरंतर है
  4. वे कर्मचारी जो ऐसे काम में लगे हैं जो तकनीकी कारणों से ड्यूटी ख़त्म होने से पहले ही करने है
  5. वे कर्मचारी जो ऐसा काम कर रहे हैं जो प्रकृति की अनियमितता पर निर्भर हैं

ये नियम पूरी तरह ओवरटाइम की वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ हैं जिसके अनुसार दिन में 9 घंटे से ज़्यादा और हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम करना ‘ओवरटाइम’ कहलाता है | ओवरटाइम की इस परिभाषा को ख़त्म करके एवं पूरक कार्य और अनिरंतर काम के बहाने ये अनुच्छेद ओवरटाइम के लिए मिलने वाली अतिरिक्त मजदूरी पर एक योजनाबद्ध हमला है |

मालिकों को बोनस से छुटकारा - 1965 के पेमेंट ऑफ़ बोनस एक्ट ने नई कंपनियों को बोनस न देने की छूट दी थी लेकिन वर्तमान कोड नई कंपनी किसे कहा जा सकता है इसे अस्पष्ट बनाकर पूरी तरह कंपनियों को बोनस देने के नियम से छुटकारा दिलवाने के चक्कर में है | नई कंपनी की परिभाषा में अब किसी “फैक्ट्री का ट्रायल रन” और “किसी खान की पूर्वेक्षण की अवस्था” भी जोड़ दी गई है जिन पर कोई समय का बंधन भी नहीं है | पुरानी कम्पनियां भी ट्रायल रन व पूर्वेक्षण की अवस्था के नाम पर मजदूरों को बोनस देने से बच सकती हैं |

इस कोड ने कंपनियों की आज्ञा के बिना उनकी बैलेंस शीट तक उजागर करने पर सरकारी अधिकारियों पर यह तर्क देते हुए प्रतिबन्ध लगा दिया है की कंपनियों पर विश्वास करना चाहिए और उन्हें अपने हिसाब-किताब की प्रमाणिकता का कोई सबूत भी देने की ज़रुरत नहीं है | यूनियनों या मजदूरों को अब मुनाफों से सम्बंधित किसी स्पष्टीकरण के लिए ट्रिब्यूनल या आरबीट्रेटर के पास जाना होगा, जो की उपयुक्त लगने पर ही स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य होंगे|

वेतन में मनमानी कटौती - अनुच्छेद 18 मालिकों को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी मजदूर के असंतोषजनक काम के चलते या अपने “नुक्सान की पूर्ति” करने के लिए उसकी तनख्वाह काट सकते हैं! क्योंकि तनख्वाह काटने के लिए किसी भी प्रकार की औपचारिक प्रक्रिया की ज़रुरत ही नहीं रह जायेगी, मालिक इसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से मजदूरों को सज़ा देने के लिए करेंगे |

लिंग आधारित भेदभाव - प्रस्तुत कोड ने 1976 के इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट (बराबर वेतन अधिनियम) के उन प्रावधानों को ख़त्म कर दिया है जो महिलाओं के लिए रोज़गार पैदा करने के पक्ष में थे और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ थे |

लेबर इंस्पेक्टर की जगह ‘फैसिलिटेटर’ - प्रस्तुत कोड कमिश्नर और इंस्पेक्टर की जगह ‘फैसिलिटेटर’ की बात करता है जो “कोड को लागू करने के लिए मालिकों और मजदूरों को सुझाव देगा” | यह फैसिलिटेटर राज्य सरकारों के नियमानुसार फैक्ट्रियों का निरीक्षण करने के लिए भी जिम्मेदार होते हैं | लेकिन प्रस्तुत कोड ऑनलाइन निरीक्षण पर ज़ोर देता है जिससे अचानक किये जाने वाले शारीरिक निरीक्षण की प्रथा ख़त्म हो जायेगी | और तो और प्रस्तुत कोड इन्टरनेट द्वारा ‘सेल्फ-सर्टिफिकेशन’ (आत्म-प्रमाणीकरण) का भी प्रावधान ले आया है |

ट्रेड-यूनियनों पर रोकटोक – यह बिल यूनियन की गतिवधियों में मज़दूरों को शामिल होने पर सीधा प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास है | इसके तेहत मज़दूरों की यूनियन की गतिविधियों में भागीदारी केवल चंदे तक ही सीमित रह पाएगी |

मालिकों के खिलाफ कार्यवाही पर रोकटोक - 1948 के ‘मिनिमम वेजिस एक्ट’ (न्यूनतम मजदूरी अधिनियम) के अनुसार न्यूनतम मजदूरी न देने से मालिक को जेल हो सकती है | 1983 के संजीत रॉय बनाम राजस्थान सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था कि न्यूनतम मजदूरी न देना बेगारी/जबरदस्ती काम लेने के बराबर है जो पूरी तरह असंविधानिक है | इसके विपरीत प्रस्तुत कोड वेतन और बोनस के सवाल को आपराधिक मामले के दायरे से सिविल मामले के दायरे में ले आया है | जो मालिक कोड का उल्लंघन करेगा उसे कोड को मानने का एक और मौका दिया जाएगा और सजा देने से पहले कोड न मानने के पीछे का कारण पूछा जाएगा | अपराधी द्वारा समझौते से निपटारा कर लेने पर उसके अपराधों को पूरी तरह माफ़ कर दिया जायेगा |     

वेतन में संशोधन के लिए तय समय सीमा का खात्मा - 1948 के मिनिमम वेजिस एक्ट के अनुसार ज़रुरत पड़ने पर न्यूनतम मजदूरी में संशोधन होना चाहिए और यह संशोधन अधिकतम पांच साल के भीतर हो जाना चाहिए | यह ट्रेड यूनियनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान है क्योंकि इसी के दम पर वे प्रबंधन से वार्ता करती हैं | लेकिन प्रस्तुत कोड में इस नियम पर भी हमला किया गया है | अनुच्छेद 8 के अनुसार “उपयुक्त सरकार हर 5 साल बाद न्यूनतम मजदूरी दर की समीक्षा या संशोधन करेगी” | समीक्षा का विकल्प लाकर 5 साल के अंतराल में वेतन संशोधन की अनिवार्यता वाले प्रावधान को एक तरह से ख़त्म ही कर दिया गया है |

प्रस्तुत कोड के ज़रिये लाये जा रहे संशोधन सीधे-सीधे मालिकों के पक्ष को और मजबूती देते हैं और मज़दूरों के हकों की लम्बी लढाई को खारिज़ करते हैं | एनडीए सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों के खिलाफ एक हों!

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (नवम्बर 2017)

(हिंदी अनुवाद – प्रबल अगरवाल)

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