कश्मीरी जनता के संघर्ष के साथ एक जुटता में खड़े हों - सीडीआरओ

18 जुलाई 2016 जब बुरहन मुजफ्फर वानी मारा गया था, तब से कश्मीर घाटी में इस हत्या के खिलाफ व्यापक विरोध-प्रदर्शन होता जा रहा है। सरकार इसे रोकने के लिए विभिन्न तरीके अपना रही है। जगह-जगह बन्द व कर्फ्यु लगा रही है। अपनी सैन्य व पुलीस बलों द्वारा क्रूर दमन चला रही है। साधारण नागरिकों की मारे जाने की संख्या 90 हो गई है। पैलेट गन से जख्मी होने की संख्या 7000 है, 1000 से ज्यादा लोग अंधे हो गये हैं, जख्मी लोगों में लगभग 17000 आम नागरिक तथा 10000 सुरक्षा बलों के लोग है। 6000 लोग या तो क्रूर काला कानून (पीएसए) पब्लिक सिक्युरिटी एक्ट के तहत हिरासत में लिए गये हैं या विभिन्न इल्जाम में गिरफ्तार किये गये हैं। रातों को दहशती छापे पड़ रहे हैं। भारतीय सेना ने ऑपरेशन काम डाउन चलाया हुआ है।

कश्मीर ही एकमात्र वह जगह है जहां पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ है। कश्मीर के अलावा भारत या दुनिया के किसी भी देश में इनका इस्तेमाल नहीं हुआ है। कोई भी सभ्य देश पैलेट गन का न तो इस्तेमाल किया है ना ही समर्थन किया है। जनतंत्र के दुश्मनों ने कश्मीर मामले में जैसे आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (ए एफ एस पी ए) को न्यायोचित ठहराया है वैसे ही पैलेट गन का इस्तेमाल किया और न्यायोचित ठहराया है।

क्या कश्मीर मामले में पाकिस्तान इंडिया के खिलाफ परोक्ष युद्ध में शामिल नहीं है?

कोऑडीनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राईट्स अर्गनाइजेशन (सीडीआरओ) यह आरोप लगाता है कि भारत सरकार के कारण पाकिस्तान कश्मीर मामले में दखल अंदाजी करने में समर्थ हुआ। 27 अक्टुबर, 1947 में इंडिया और पाकिस्तान ने जम्मु कश्मीर (जे एण्ड के) को अलग किया जबकि उस समय यह सारा क्षेत्र पुरी तरह इंडिया के नियंत्रण में था। वहां की जनता जम्मु कश्मीर वितर्क को राजनीतिक सामाधान के लिए आन्दोलन कर रही थी यह उनकी दीर्घकालीन मांग थी।

यह सच है कि पाकिस्तान लश्कर ए तोएबा और जैश इ मोहम्मद की मदद से आक्रमण चला रहा था। हालांकि भारत सरकार के नियतंत्रण वाले क्षेत्र में बहुत लम्बे समय से विक्षोभ व उथल पुथल चल रहा है। सभी शान्ति पूर्ण उपायों का इस्तेमाल कर जनता अपने आत्म निर्णय के अधिकार की मांग के लिए लड़ी है। चुनाव में भागीदारी कर के भी पिछले 68 सालों में अपने क्रूर अत्याचारी जनता के इस सर्घर्ष को खत्म करने में सफल नहीं हुआ है।

पिछले 27 साल से जम्मु कश्मीर को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया है और ए एफ एस पी ए (अफस्पा) लागु है। सुरक्षा बल संघर्ष का क्रूर दमन किया है और हमें कहा गया है अब सब कुछ ठिक ठाक है। लेकिन स्थिति कभी भी सामान्य नहीं हुआ है, समय-समय पर संघर्ष और उसका क्रूर दमन होता रहा है। और 27 साल से यह होता जा रहा है। इस दौरान संवैधानिक गारंटी और वादे के बावजूद जम्मु कश्मीर की स्वतंत्रता बहाल करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया है।

हम जोर देकर कहते हैं कि जनतांत्रिक सामाधान के सभी रास्ते बंद कर भारत सरकार ने पाकिस्तान को दखल अंदाजी का मौका प्रदान किया है।

1953 में शेख अब्दुला के गिरफ्तारी के समय से भारत नियन्त्रित क्षेत्र में जनता दमन झेलती आयी है। सन् 1975 में पार्थसारथी-अफजल बेग समझौते के परिणाम स्वरूप शेख अब्दुल्ला के सत्ता में लौटने के बावजूद जम्मु-कश्मीर की स्वायत्तता बहाल करने के वादे को कभी नहीं माना गया। केन्द्र सरकार सम्पूर्ण नियन्त्रण करती रही। यहां तक कि चुनी हुई राज्य सरकार पैलेट गन के इस्तेमाल को नहीं रोक सकी। सुरक्षा बलों को वापस नहीं बुला सकी, अफस्पा को हटा नहीं सकी व केन्द्र सरकार के अनुमति के बिना गिरफ्तार लोगों को रिहा नहीं कर सकती।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जो इंडिया से अलग होना चाहते हैं हमें उनका समर्थन करना चाहिए?

सीडीआरओ मानता है कि इंडिया की एकता का मतलब इंडिया की जनता की एकता है। भारत की जनता की एकता के बिना क्षेत्रिय एकता का कोई मायने नहीं है, और जनता की एकता का मतलब दमन का सामना कर रहे लोगों के साथ खड़े हो और उनके जनतांत्रिक समाधान की मांग का समर्थन करें। बिना किसी पूर्व शर्त के पिछले 18 साल से भी ज्यादा समय से नागालैंड में भारत सरकार संवाद चला रही है। कश्मीर में वैसा ही क्यों नहीं हो सकता है।

सीडीआरओ मानता है कि हम तब तक देश की एकता के लिए लड़ नहीं सकते जब तक कि जिसे हम अपना अभिन्न हिस्सा होने का दावा करते हें। कश्मीरी जनता जो 28 सालां से सैन्य शासन झेल रही है, उकने दुःख दर्द से आहत नहीं होते हैं। जम्मु कश्मीर अशांत क्षेत्र बना हुआ है और सैन्य बल आम नागरिक के किसी किस्म के चोट, हत्या, बलात्कार, यातना, लापता हो जाने के अभियोग मुकद्दमे से कानूनी सुरक्षा को उपभोग कर रहे हैं।

1989-90 से अब तक 70,000 लोग मारे गये हैं, सैकड़ों महिलाएं यौन उत्पीड़न झेली है, 810000 लोग हिरासत में लिए जाने के बाद से लापता हैं, 60000 लोग कठोर यातना के शिकार हैं। इन 27 वर्षों की अवधि के दौरान आफस्पा का सुरक्षा बलों के अत्याचार का मुश्किल से ही लोगों ने विरोध किया है या कश्मीरी जनता का समर्थन किया है सहायता का हांथ बढ़ाया है।

यही सब कुछ कश्मीरी जनता को आजादी की मांग के लिए मजबुर किया है जो कि उत्पीड़न से आजादी की चीख है।

यह सब तो ठिक है लेकिन उन कश्मीरियों का समर्थन क्यों जो पाकिस्तान के इशारों पर नाच रहे हैं?

1947 में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नैशनल कानफरेन्स (एन सी) को इंडिया के साथ आना पड़ा जब सारा भारत और पाकिस्तान खून से सना हुआ था। पाकिस्तान में सिक्ख व हिन्दू तथा भारत में मुसलमान मारे जा रहे थे याद रखने योग्य बात है कि उस समय कश्मीर में शांति थी यहां तक कि कश्मीर से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों को सुरक्षित यात्रा का आश्वासन प्रदान किया लेकिन एक जगह मुसलमानों का कत्ले आम हुआ पर इस घटना से भी कश्मीरी उत्तेजित नहीं हुये थे।

यह स्मरणीय है कि 1947 में शेख अब्दुल्ला जब सत्ता में आये तुरंत ही अक्टुबर में मूलभूत भुमि सुधार लागू हुआ। जागीरदारी प्रथा खत्म किया गया और प्रत्येक जोतने वाले को जमीन बांटा गया। उससे पहले डोगरा राजा के शासन काल में किसानों का जमीन पर कोई अधिकार नहीं था, सारी जमीन राजा की होती थी। इससे हिन्दु-मुसलमान सभी खेतिहरों को फायदा हुआ। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि जिन्होंने यह चुनाव किया कि वे भारत के साथ रहेंगे अपने मन को बदल लिया। यही सवाल है जो हमारे मन में उठना चाहिए। 1953 से जम्मु कश्मीर के हर चुनाव में हेराफेरी होती थी और केन्द्र सरकार ऐसा होने देती थी। ऐसा इसलिए होना सम्भव हुआ क्योंकि वे मुख्य मंत्री चुनते थे सम्पूर्ण विधान मंडल को नहीं। इसके अलावा  इंडिया के साम्प्रदायिक संगठनों खासकर दक्षिणपंथी पार्टीयों ने देश बंटवारे के दर्दभरी यादों को ताजा रखा तथा सरे आम मुसलमानों पर शक की निगाह बनाये रखा व उनकी देश के प्रति वफादारी पर सवालिया निशान लगाया।

भारत के और जगहों की तरह खासकर आदिवासियों में और पूर्वोत्तर राज्यों में कश्मीर में भी जमीन हथियाना एक मुद्दा है। पूर्वोत्तर राज्यों की तरह जम्मु कश्मीर में भी स्थानीय लोग अपनी जमीन व संसाधनों की रक्षा करते हैं। अन्य जगहों की तरह जम्मु कश्मीर में भी सरकार धनी व सुविधा सम्पन्न लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए लोगों के जमीन का अधिग्रहण करती है। अन्य जगहों की तरह जनता इसका प्रतिरोध करती है।

जम्मु कश्मीर में बेकारी समस्या भी काफी है 40 प्रतिशत शिक्षित बेकार हैं। उद्यान कृषि व फल वाटिका जम्मु-कश्मीर का प्रमुख आर्थिक सहारा है और जमीन की कमी है। सुरक्षा बलों ने काफी ज्यादा कृषि लायक जमीन पर कब्जा किया हुआ है। सरकारी क्षेत्र में ज्यादातर नौकरियां सशस्त्र पुलिस बल में है और वह भी ठेके पर, जहां कुल वेतन मात्र 6000 रू. है। उदाहरण स्वरूप 2016 में मोदी सरकार ने पुलिस बल में 10000 लोगों की बहाली की घोषणा की।

जरा सोचिए 1.3 करोड़ की आबादी पर साढ़े छह लाख सौन्य और पुलिस बल है सभी शसस्त्र हैं तथा कानूनी प्रतिरक्षा का उपभोग करते हैं मतलब कि कत्ल, बलात्कार, यातना या कोई भी अपराधिक मामले से वे सुरक्षित हैं। आफस्पा के तहत वे संदेह मात्र से किसी की हत्या कर सकते हैं। कल्पना कीजिए कि 27 सालों से वे ऐसी स्थिति में जी रहे हैं। अपने आप को ऐसी परिस्थिति में रखकर सोचिए, हमारा कैसा मनोभाव होता? ऐसी परिस्थिति में अगर कश्मीरी लोगों को गुस्सा है तो क्या कोई हैरानी वाली बात है।

युपीए सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एम के नारायण ने हाल ही में कहा है कि कश्मीरी आन्दोलन पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित नहीं है, यह स्थानीय आन्दोलन है। अगर भारत के उच्चतम सुरक्षा विशेषज्ञ ऐसा कहते हैं तो निश्चित यही वह समय है जब हम कश्मीरियों को पाकिस्तान की कठपुतली कहकर गाली देना बंद करें। उन्हें अपने लोग समझे जो हमेशा के लिए एक जनतांत्रिक समाधान की मांग कर रहे हैं और अपनों की तरह का बर्ताव करें।

यह सब तो ठिक है पर कश्मीरी पंडितों के बारे में क्या

सीडीआरओ का स्पष्ट समझ है कि 3 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों का विस्थापन एक भयावह घटना है वह अपने घर, जड़, जमीन से उखड़े हैं और आज तक लौट नहीं पाये हैं। सम्पूर्ण कश्मीरी समाज पर यह आरोप है कि वह कश्मीरी पंडितों को निरापद व सुरक्षित महसूस नहीं करा पाया है पर इससे भी बड़े आरोपी गर्वनर जगमोहन और वीपी सिंह सरकार है जिन्होंने कश्मीरी पंडितों को उनके अपने जगहों पर जहां वे काम करते थे, रहते थे वहां सुरक्षा नहीं करके उन्हें जम्मु और अन्य जगहों पर भेजे थे। 27 सालों से राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जम्मु कश्मीर केन्द्र सरकार की तानाशाही में पीस रहा है। उनकी कमान में विशाल सैन्य ताकत होने के बावजूद कश्मीरी पंडितों को वापस उन्हीं की जगह पर बसा पाने में विफल रहे।

कश्मीरी पंडितों के काफी पहले से भारत सरकार के हाथों स्थानीय मुसलमान यातना झेल रहे हैं। यह भारत सरकार ही है जिसने 1953 में जम्मु कश्मीर को प्राप्त संवैधानिक स्वायत्तता का उल्लंघन किया था और दिल्ली से जम्मु कश्मीर का शासन चल रहा था। पिछले 27 सालों से वहां स्थिति सामान्य नहीं है। चुंकि मसले का रजनीतिक समाधान के लिए कोई गम्भीर प्रयास नहीं है, समय समय पर विरोध फुट पड़ता है। भारतीय सेना ने भी कहा है कि कश्मीर व पूर्वोत्तर राज्यों की समस्या का कोई सैन्य समाधान नहीं हो सकता है, बल्कि राजनीतिक समाधान ही एकमात्र उपाय है। सैन्य केवल कानूनी नियमन कर सकता है। 27 साल के बाद भी परिस्थिति सामान्य क्यों नहीं है। मणिपुर के 1528 फर्जी मुठभेड़ मामले से सम्बन्धित सुनवाई में जबकी इण्डिया के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने भी भारत सरकार से यही सवाल किया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर (मणिपुर में 46 साल में, नागालैंड में 68 सालों में और 27 सालों में कश्मीर में) स्थिति सामान्य नहीं कर पाई तो नीति में ही कहीं गलती है। गलत इसलिए भी क्योंकि इतने सालों से अफस्पा के तहत सैन्य शासन हमारी अपनी जनता के साथ एक क्रूर अमानवीय मजाक है जिनके संविधान द्वारा प्रदान किया गया जनवादी अधिकार का दशकों से निषेध किया जा रहा है।

इसलिए कश्मीरी जब आजादी की मांग करते हैं तो वे असल में उत्पीड़न से आजादी चाहते हैं जो कि उन्हें भारत में नहीं दिखता फिर आजादी की मांग करने पर उन पर आरोप क्यों लगायें?

कश्मीरी अतिवादी लड़ाकू लेकिन मुस्लिम कट्टर पंथी हैं?

कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वह पूरे भारत में जो हो रहा है उससे सम्बन्धित है। शासक पार्टी के रूप में आर एस एस-भाजपा के सत्ता में आने के बाद सभी यातनायें बढ़ी हैं। पिछले 30 महीने से भगवा ब्रिगेड ने दलित मुस्लिम व जो भी उनके राजनीति को चुनौती देता है उनके खिलाफ खूनी अभियान चलाया हुआ है। हमने ‘घर वापसी’, ‘लव जेहाद’ जैसा अभियान देखा है। कोई भी जो उनके कट्टर पंथी हिन्दुत्व अभियान पर सवाल उठाता है, उन पर देशद्रोही का आरोप लगाया जाता है, उन को गाली दिया जाता है, बदनाम किया जाता है, उन पर आक्रमण किया जाता है। कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके में भी भेदभाव वाला अभियान चलाया गया है, गौरक्षकों ने एक मुसलमान ट्रक ड्राईवर की पीट-पीट कर हत्या की है, भाजपा विधायक ने एक और मुसलमान विधायक पर जानलेवा हमला किया है। ये मुस्लिम घृणा वाल प्रवचन देते हुए धार्मिक यात्रायें निकाले हैं। यह घटनायें जम्मु कश्मीर के मुसलमानों में एक भय का माहौल पैदा किया है। उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ी है। खासकर ऐसे समय में जब भारतीय सेना, संघ व भाजपा शासित केन्द्र सरकार के नियंत्रण में है। जनता को असुरक्षित महसूस करया जाता है वे पैलेट गन, रात में पड़ने वाले छापे, गिरफ्तारी, यातना के दहशत में जीवन बिताते हैं, और बाकी भारतीय जनता चुप रहती है इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाती है। ऐसी हालात में कश्मीरी जनता इंडिया से, भारतीय जनता से अलगाव महसूस करती है। हमारी चुप्पी उन्हें संदेश देती है कि हमें उनकी कोई परवाह नहीं है बस उनके जन्म भूमी के मनोरम सौन्दर्य की वहां के जमीन की परवाह है।

दूसरी तरफ धार्मिक कट्टर पंथियो के लिये दूसरों के लिए घृणा और नफरत होता है। ऐसे में यह चिन्हित करने वाली बात है कि अत्यंत बदनाम कश्मीरी लड़ाकू अतिवादी अमरनाथ यात्रियों का स्वागत करते हैं वे कश्मीरी पंडितों की भी स्वागत करते हैं। यात्रियों पर अतीत में जो हमले हुए भी हैं वे हमलावर बाहरी थे कश्मीरी नहीं। अगर केन्द्रीय सत्ता में विराजमान हिन्दुत्ववादी कट्टर पंथी ताकतों ने सम्पूर्ण भारतवासी को संघी भाजपा समर्थक में तब्दील नहीं कर दिया है तो कश्मीर की जनता के संघर्ष को कट्टर पंथी मुस्लिम संघर्ष कह कर नकार देना और भी गलत होगा। जबकि वे हिन्दुत्ववादी कट्टर पंथी गुटों की तरह ताकतवर नहीं है, वे इनकी तरह सत्ताधारी भी नहीं है।

भाजपा, पीडीपी के सरकार गठन ने जम्मु कश्मीर के वर्तमान हालात में योगदान दिया है। संघी, भाजपा को बाहर रखने के नारे पर पीडीपी ने अपना चुनाव अभियान चलाया था। लेकिन जैसे ही इसने जनादेश के नाम पर गठबंधन सरकार का गठन किया, संघ व भाजपा ने मंत्रिपद हथियाकर अपने हठधर्मी धार्मिक एजेन्डा को आगे बढ़ाया। ऐसा एक मंत्री नियुक्त किया जो किश्तवार में दो व्यक्ति को पीट-पीट कर हत्या करने का आरोपी है। मुस्लिम विरोधी अभियान धारा 370 का खात्मा जैसे मुद्दों के द्वारा अपने साम्प्रदायिक एजेंडा को आगे बढ़ाया, मुस्लिम ट्रक ड्राइबर की हत्या, विधानसभा के अन्दर उनसे सहमत न होने के कारण भाजपा विधायक का मुस्लिम विधायक पर हमला जैसी घटना। 8 जुलाई से आज तक पैलेट गन के इस्तेमाल से लोगों को अंधे और जख्मी करने, बुढ़े, नौजवान, बच्चे महिलाअें को गिरफ्तारी को समर्थन कर सुरक्षा बलों को प्रोत्साहित कर रहा है और इस तरह केन्द्र तथा राज्य सरकार निहत्थे नागरिकों पर दमन अभियान चला रहे हैं। भारत सरकार रात दिन यह प्रचार कर रही है कि यह सब कुछ पाकिस्तान के कारण हो रहा है। लेकिन कोई भी इस की व्याख्या नहीं कर सकता कि जम्मु कश्मीर का यह हिस्सा 1947 से भारत के नियंत्रण में है और चुनाव में जनता बढ़-चढ़ कर भागीदारी करती है, वोट डालती है फिर पाकिस्तान कैसे यहां पर इतनी आसानी से समस्या पैदा सकता है। अगर 68 साल का नियन्त्रण और 27 साल के सैन्य दमन के बाद भी जम्मु कश्मीर में सरकार स्थिति सामान्य नहीं कर पाई है तब इसका मतलब है इस परिस्थिति के लिए सरकार जिम्मेदार है और पाकिस्तान को बहती गंगा में हाथ धोने का मौका दे रही है। इसका यह मतलब भी है कि भारत सरकार जम्मु कश्मीर समस्या का कोई राजनीतिक समाधान चाहती ही नहीं है।

दोस्तों सीडीआरओ इस पर्चे के द्वारा आपसे अपील करता है कि सच्चाई का दूसर पक्ष भी होता है जो जनता के सामने उजागर होना चाहिए इसलिए सीडीआरओ कश्मीरी जनता की मुक्ति के इस संघर्ष में उनके साथ खड़ा है और पैलेट गन के इस्तेमाल कर बच्चे, बुढे सहित निहत्थे नागरिकों की हत्या कर, नौजवान लड़के-लड़कियों को जख्मी व अंधा करने के लिए हजारों हजार लोगों पर अत्याचार का निन्दा करता है। और जोर देकर कहता है कि राजनीतिक समाधान की खोज, नागरिक अधिकार की बहाली, सशस्त्र बलों को हटाने से ही जम्मू कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल हो सकता है और हिंसा का खात्मा हो सकता है। जो कि हमें अन्दर से कमजोर कर रहा है। कश्मीरी जनता मारी जा रही है, उन पर पैलेट गन का इस्तेमाल हो रहा है जिससे नौजवान लड़के, लड़कियां अंधे हो रहे हैं। बुरी तरह से जख्मी हो रहे हैं, उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है, रातों को उनके घरों पर छापे डाले जा रहे हैं, न्याय मिलने की अधिकार से वंचित किया जा रहा है, और समस्या के राजनीतिक समाधान को नजर अंदाज किया जा रहा है। सीडीआरओ को विश्वास है कि इन उपायों से जनता की भावना को जीता नहीं जा सकता है, उन पर जीत हासिल नहीं किया जा सकता है।  ऐसी परिस्थति में हमारी अपनी जम्मु कश्मीर की जनता को यह जानने की जरूरत है कि हमें उनकी परवाह है। पाठकों सीडीआरओ आप से अपील करता है कि स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए अपने जम्मु कश्मीर की जनता को एक जुटता का संदेश देने के लिए हमारे साथ शामिल हो।

CDRO Constituent Organisations: Association for Democratic Rights (AFDR, Punjab), Association for Protection of Democratic Rights (APDR, West Bengal); Asansol Civil Rights Association, West Bengal; Bandi Mukti Committee (West Bengal); Civil Liberties Committee (CLC, Andhra Pradesh); Civil Liberties Committee (CLC, Telangana); Committee for Protection of Democratic Rights (CPDR, Maharashtra); Committee for Protection of Democratic Rights (CPDR,Tamil Nadu); Coordination for Human Rights (COHR, Manipur); Human Rights Forum (HRF, Andhra Pradesh & Telengana); Manab Adhikar Sangram Samiti (MASS, Assam); Naga Peoples Movement for Human Rights (NPMHR); Peoples’ Committee for Human Rights (PCHR, Jammu and Kashmir); Peoples Democratic Forum (PDF, Karnataka); Jharkhand Council for Democratic Rights (JCDR, Jharkhand); Peoples Union For Democratic Rights (PUDR, Delhi); Peoples Union for Civil Rights (PUCR, Haryana), Campaign for Peace & Democracy in Manipur (CPDM), Delhi.

Published on 27th October 2016

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