भगवा ब्रिगेड के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों की खुलेआम हो रही हत्याओं का सिलसिला कब तक?

पीयूडीआर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की कड़ी निंदा करता है | ‘गौरी लंकेश पत्रिका’ की संपादक लंकेश की 5 सितंबर को बेंगलुरु में उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई | कन्नड़ भाषा में प्रकाशित इस पत्रिका के माध्यम से गौरी लगातार जाति व्यवस्था, अंधविश्वास, कट्टरपंथी हिंदुत्ववाद, फासीवाद, भ्रष्टाचार और लिंग आधारित भेदभाव आदि के खिलाफ लिखती आईं थीं | उनके लेखन में वे सीधा बीजेपी, आरएसएस और इनसे जुड़े संगठनों और नेताओं की तीखी आलोचना करती आईं थीं | उनके आखिरी संपादकीय ‘फ़ेक न्यूज़ के ज़माने में  में भी उन्होने प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी, और आरएसएस द्वारा मीडिया पर झूठ पर आधारित दुष्प्रचार की पोल खोली थी | गौरतलब है की डिजिटल मीडिया के आने के बाद भी इस लघु पत्रिका को पढ़ने वालों की संख्या 10 से 15 हज़ार के बीच थी | आर्थिक तंगी के बावजूद लंकेश ने अंत तक पूरी कोशिश की कि पत्रिका के खर्च के लिए विज्ञापनों का सहारा न लेना पड़े | गौरी लंकेश करनाटक फोरम फॉर कम्युनल हारमनी (कर्नाटक कोमु सौहार्द वेदिके) नाम के अभियान का हिस्सा भी थी |

गौरी पर लगातार निशाना साधा जा रहा था | उनके वकील बी.टी. वेंकटेश  का कहना है की उन्हें 2004 से धमकियां मिल रही थीं | लंकेश ने खुद इस बात को उजागर किया था की कैसे हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा कर्नाटक और अन्य जगहों पर पत्रकारों और तर्कवादी लेखकों को मौत की धमकियां और हमले कितने आम हो चुके हैं  | नवम्बर 2016 में उन्हें बीजेपी के नेताओं के खिलाफ लिखने के लिए मानहानि के मामले में सजा सुनाई गई थी  | जिसके तुरंत बाद पार्टी के इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्विटर पर इस मामले का हवाला देते हुए और पत्रकारों को धमकाया था की वे आगे से ध्यान रखें  | हिन्दुत्ववादी संगठनों जैसे सनातन संस्था, हिन्दू जागरण वेदिके, श्री राम सेने, बजरंग दल, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा आदि द्वारा इस प्रकार की धमकियों के अनेकों उदाहरण हैं  |

इस हत्या को देश भर में हिंदुत्ववादी आतंकियों द्वारा चल रहे प्रहार की कड़ी में ही समझा जाये | रोज़मर्रा की हर छोटी-बड़ी गतिविधि जैसे खाना, जीविका, शिक्षा, शादी आदि का भगवाकरण किया जा रहा है | सभी संस्थानों में हिंदुत्ववाद थोपा जा रहा है – कहीं कानून के बल पर, कहीं राज्यसत्ता, कहीं मार-पीट, तो कहीं बंदूक के बल पर | मुख्यधारा वाले मीडिया घरानों से देश की हिंदुत्ववादी राज्यसत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने की उम्मीद नहीं की जा सकती | और जो लोग आवाज़ उठा रहे हैं, उनको निशाना बनाया जा रहा है, जैसे लिंगंना सत्याम्पेत (सम्पादक, बसवामार्ग), बी.वी.सीताराम (सम्पादक, करावली आले), नवीन सूरिन्जे (टीवी पत्रकार), के.एस. भगवान (कन्नड़ लेखक), पनसारे (मराठी लेखक), दाभोलकर (महाराष्ट्र अंधविश्वास निर्मूलन समिति), कलबूर्गी (कन्नड़ लेखक), श्याम सुन्दर सोनार (मराठी अखबार ‘प्रहार’) और अब लंकेश | खुलेआम हो रहे इन हमलों और हत्याओं का सिलसिला आखिर कब तक चलेगा? यह तय है की नागरिकों द्वारा इन मामलों में चुप्पी साधने का एक ही मतलब होगा - संविधान द्वारा अधिकृत अभिव्यक्ति की आज़ादी का त्याग!

एक बार फिर प्रधानमंत्री जी चुप हैं | मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए बीजेपी नेता रवि शंकर प्रसाद संघ परिवार के मानव अधिकार की बात कर रहे हैं और नक्सलियों पर शक जता रहे हैं  | वहीं कर्नाटक के बीजेपी विधायक जीवराज का बयान है की अगर गौरी आरएसएस के बारे में न लिखतीं तो आज जिंदा होतीं  | इस बीच कर्नाटक सरकार ने 25 ऐसे कन्नड़ लेखकों और पत्रकारों को सुरक्षा देने का फैसला किया है जो धर्म और हिंदुत्ववाद पर लिखते आये हैं | विगत में हुए हमलें, उन हमलों और गौरी की हत्या के तरीके में समानता, गौरी के निर्भीक लेख, धर्म और जाति पर उनके विचार, दक्षिणपंथी नेताओं के बयान - इन सबसे गौरी के हत्यारों के संभव ताल्लुकात के बारे में कुछ जवाब स्पष्ट नज़र आते हैं |

उल्लिखित हत्याओं के मामलों में पुलिस और प्रशासन द्वारा उठाये गए कदम निष्क्रिय रहे हैं | ऐसे में नागरिकों को खुद ही अपने हकों के लिए लड़ना पड़ेगा | इसके अतिरिक्त वे संस्थान जो नागरिक संगठनों को सशक्त करने के लिए स्थापित किये गए थे, उनसे पीयूडीआर अपनी नींद तोड़ने की अपेक्षा करता है | इस दौर में जब लोकतान्त्रिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पीयूडीआर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को अपना दायित्व याद दिलाते हुए मांग करता है की हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा देश भर में खुलेआम पत्रकारों, लेखकों, और तर्कवादियों पर किये जा रहे हमलों का जायज़ा लिया जाए, उन पर सुनियोजित रूप से निगरानी रखी जाए और इन संगठनों के खिलाफ उचित कार्यवाही की जाए |

सीजो जॉय, अनुष्का सिंह

सचिव, पीयूडीआर

10 सितंबर 2017

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