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मज़दूरों को कठोर सजा देने वाले मारूति केस के अन्यायी अदालती फैसले की पहली बरसी पर पी.यू.डी.आर. की रिपोर्ट

पीपुल्स यूनियन फॉर डैमोक्रैटिक राइट्स
18 मार्च 2018
प्रेस विज्ञप्ति

मज़दूरों को कठोर सजा देने वाले मारूति केस के अन्यायी अदालती फैसले की पहली बरसी पर पी.यू.डी.आर. की रिपोर्ट

‘A Pre-Decided Case: A Critique of the Maruti judgment of 2017’

March 2018

18 मार्च 2017 को हरियाणा में गुरुग्राम सेशंस कोर्ट ने मारूति कंपनी के 31 बर्खास्त कामगारों को सज़ा सुनाई, जिनमें से 13 मजदूरों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई। इन सभी को अदालत ने हफ्ते भर पहले 10 मार्च 2017 को दोषी करार दिया था। अतिरिक्त सेशंस जज आर.पी. गोयल ने 117 कामगारों को बरी कर दिया। इन सभी को 5 साल पहले गिरफ्तार किया गया था और 2 से 4 साल तक जेल में रखा गया था। जिन 13 कामगारों को सबसे कड़ी सज़ा दी गई है वे मारूति यूनियन के सक्रिय सदस्य और पदाधिकारी थे।
यह मामला 18 जुलाई 2012 को हुई हिंसक घटना का था जिसमें मारूति प्लांट के कई हिस्सों में आग लगा दी गई थी। कुछ मैनेजर और वर्कर जख्मी हुए थे और मानव संसाधन मैनेजर, अवनीष देव की दम घुटने से मौत हो गई थी। कुल 148 कामगारों को घटना के संबंध में दोषी बनाया गया था और सभी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया था। इस घटना के बेहद अन्यायी अदालती फैसले की पहली बरसी पर पीपुल्स यूनियन फॉर डैमोक्रैटिक राइट्स (पी.यू.डी.आर.) अपनी रिपोर्ट ‘‘ए प्री-डिसाइडिड केस: ए क्रीटीक आॅफ़ द मारूति जजमेंट आॅफ़ 2017‘‘ मार्च 2018 प्रस्तुत कर रहा है। 
यह रिपोर्ट इस फैसले और इस मामले के अन्य आधिकारिक दस्तावेजों के गहन अध्ययन पर आधारित है।
पुलिस जांच की प्रकृति, मुकदमे की प्रक्रिया और आरोप पक्ष द्वारा पेश की गई कहानी पर भी यह रिपोर्ट सवाल उठाती है। इस फैसले के निहितार्थ बड़े भयानक हैं, न केवल मारूतिं और अन्य ऑटोमोबाइल उद्योग के कामगारों के लिए बल्कि देश भर के मज़दूर संघर्ष के लिए।
मारूति मामले के संदर्भ, जांच और अभियोजन जिन्होंने इस पक्षपाती फैसले को संभव बनाया, उसे तीन मुख्य पहलुओं द्वारा समझा जा सकता है: 
(क) पूंजी-श्रम के टकराव और मारूति मज़दूरों के संघर्ष के दीर्घकालीन और समकालीन इतिहास के संदर्भ मे जिसमें मज़दूर बुनियादी श्रम अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं और कंपनी बार-बार उसे नाकाम करती रही है। 
(ख) ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मारूति कंपनी का दबदबा और उसकी वास्तविक आर्थिक सत्ता। इंडस्टिेªअल माॅडल टाउनशिप (आई.एम.टी.) मनेसर और राज्य की मशीनरी और संस्थानों पर इसकी पकड़। 
(ग) पूंजी-श्रम के टकराव की बदलती प्रकृति और सीधे विदेशी निवेश और कारोबार की सुविधा के मसले का बढ़ता महत्व।
इन मसलों की चर्चा इस रिपोर्ट के पेज (4-9) पर की गई है।
मारूति कंपनी में वाजिब मज़दूरी, काम के बोझ में कमी और प्रतिनिधित्वकारी यूनियन जैसे मसलों को लेकर पिछले कई सालों से मज़दूरों का संघर्ष होता रहा है। कंपनी ने बड़े आक्रामक तरीके से इसे नाकाम किया है इसके लिए कंपनी ने बार बार मज़दूरों को निलंबित करने, बर्खास्त करने, तबादले करने, मज़दूरी काटने, मज़दूरों से ज़बरदस्ती ‘अच्छे व्यवहार के शपथपत्र‘ पर साइन कराने जैसे हथकंडे अपनाए हैं (रिपोर्ट का पेज 5ेै)।
कंपनी अपनी विराट आर्थिक सत्ता के बूते यह सब कर सकी है। उसकी सत्ता के कई स्त्रोत हंै मसलन पैसेंजर कार बाज़ार के 50 फीसदी पर उसका एकाधिकार, आई.एम.टी. मानेसर में उसका दबदबा जहाँ उसके पास 600 एकड़ ज़मीन है और उसकी कई सारी सहायक और वेंडर इकाइयां हैं। कंपनी की अपार सत्ता और हुकूमत कंपनी पर ही नहीं चलती बल्कि राज्यसत्ता के संस्थानों पर भी चलती है मसलन श्रम विभाग, पुलिस और न्यायपालिका पर।
न्यायाल्य का फैसला
मारूति कंपनी में हुई वारदात की तहकीकात, मुकदमा और फैसला कंपनी की सत्ता और पकड़ की मिसाल है। कंपनी ने आरोप पक्ष के जरिए जो कहानी प्रस्तुत की, उसे अदालत ने अपने फैसले में सही माना है, इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से इसी की विवेचना की गई है।
इस क्रम में, कंपनी द्वारा पेश कहानी के संबंध में बचाव पक्ष द्वारा बताई गई खामियों और सवालों का ज़िक्र भी किया गया है। जज ने जिस तरह हर बिंदु पर कंपनी के पक्ष में दखल अंदाजी की है उसका एक पैटर्न उभर कर आता है। मारूति के मानेसर प्लांट में 18 जुलाई 2012 को हुई घटना पर दर्ज़ प्राथमिकी (प्रथम सूचना रिपोर्ट, एफ.आई.आर.) अभियोजन पक्ष की कहानी का आधार बनी। 
एफ.आई.आर.:
मारूति के जनरल मैनेजर विजिलेंस दीपक आनंद द्वारा की गई शिकायत के आधार पर घटना के दिन 11 बजे रात को 55 नामित और 500 से 600 अनामित मज़दूरों के खिलाफ प्राथमिकी नंबर (184/2012 , थाना मानेसर, हरियाणा) में दर्ज़ की गई। दीपक आनंद बाद में आरोप पक्ष के गवाह नंबर 29 के रूप में पेश हुए।
बचाव पक्ष की जिरह के दौरान आरोपी पक्ष की कथा में कई सारी विसंगतियां उभर कर आईं। मसलन यह बात स्पष्ट है कि गवाह न. 29 घटना के चश्मदीद गवाह हो ही नहीं सकते थे (पेज 11 ) क्योंकि वे भूतल पर थे जबकि घटना पहली मंज़िल पर हुई थी। वे एक मज़दूर को छोड़कर किसी मज़दूर को नहीं पहचान सके। अभियोजन की ओर से यह दलील दी गई की उन्होंने घटनाओं को सीसीटीवी कैमरे से देखा था लेकिन इन कैमरों के कोई रिकाॅर्ड उपलब्ध नहीं किए गए। मैनेजमेंट ने यह दावा किया कि वे जल गए थे, पर अचमभे की बात यह है की उनके जलने का कोई भी प्रमाण नहीं पेश किया गया।
प्रमुख गवाह के रूप में अभियोजन गवाह न. 29 की विश्वसनीयता तब और भी कमज़ोर पड़ गई जब उन्होंने मज़दूरों द्वारा इस्तेमाल हथियारों के नाम प्राथमिकी में, ‘‘बेलचा, लाठी, लोहे के सरिए और डंडा‘‘ बताये परन्तु पुलिस के सामने दिए गए बयान में उन्होंने हथियारों के नाम बदल कर ‘‘डोर बीम‘‘ और ‘‘शॉकर‘‘ बताए (पेज 14)। जज ने इस विसंगति को न केवल स्वीकार कर लिया बल्कि इसे सही बताया। यह बतलाता है की फैसले के ज़रिये जज की दखलंदाजी किस किस्म की थी। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट का दफ्तर थाने के पास ही है फिर भी प्राथमिकी उसी थाने में दर्ज़ होने के 5 घंटे बाद 19 जुलाई की सुबह पहुंचाई गई। 5 घंटों का यह अंतराल, पुष्टि करने वाले साक्ष्यों का ना होना और ऐसी ही अन्य खामियों को जज ने बिना कोई सवाल किए स्वीकार कर लिया।
दूसरी ओर मज़दूरों की प्रतिवादी शिकायत खारिज कर दी गई की मैनेजमेंट ने मैनेजर अवनीश देव को पीटने और आग लगाने के लिए भाड़े के बाउंसर मंगाए थे।
यह रिपोर्ट 18 जुलाई 2012 की घटना को लेकर प्राथमिकी में दर्ज ब्योरे के कई पहलुओं पर चर्चा करती है जो कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान संदेहास्पद और मनगढ़ंत साबित हुए। (पेज 11-25) 
इनमे से कुछ ये हैः
ऽ    आग से अवनीश देव की मौत 
अभियोग पक्ष की कहानी और मज़दूरों के खिलाफ मुकदमे का मूल बिंदु यह था कि उन्होंने प्लांट में आग लगा दी और एचआर मैनेजर अवनीश देव पर हमला कर उन्हें मार डाला लेकिन अभियोग पक्ष द्वारा पेश कोई भी गवाह यह नहीं बता सका की आग किसने लगाई थी (पेज 13)। कोई और साक्ष्य भी नहीं था जो आग लगने की घटना में मज़दूरों का हाथ बताता हो। दोषी करार दिए गए मज़दूरों को अवनीश देव की मौत से जोड़ने वाला कोई साक्ष्य नहीं है।
यह रिपोर्ट आरोप पक्ष के गवाहों के बयानों में मौजूद असंगतियों की ओर इशारा करती है और बताती है इस बात को लेकर भी बड़ा भारी भ्रम है कि अवनीश देव पर किसने और कितने लोगों ने हमला किया (पेज 15)। 
अगर गवाहों के बयानों के आधार पर ही दोष साबित होना है और इस मामले में ऐसा ही हुआ है तो यह जरूरी है कि बयान अकाट्य हो लेकिन रिपोर्ट दिखाती है कि अभियुक्त के गवाहों द्वारा दिए गए बयान ऐसे नहीं हैं कि महज उन्हीं के आधार पर दोष साबित मान लिया जाए। फिर भी प्राथमिकी और अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में मौजूद बड़ी भारी विसंगतियों को जज ने ‘‘छोटी मोटी विसंगतियां‘‘ स्वीकार करके भी नजरअंदाज कर दिया और मजदूरों को आगजनी, चोट पंहुचाने और अवनीष देव की हत्या के इल्जाम में बिना पुख्ता साक्ष्य के, सजा सुना दी।
जज ने यह अजीबोगरीब दलील पेश की कि क्योंकि मज़दूर अपना कहा साबित नहीं कर पाए कि उन्होंने आग नही लगाई और अवनीश देव के साथ मारपीट नही की और यह सब दरअसल कंपनी द्वारा बुलाया गया बाउंसरों ने किया, इसलिए आरोप पक्ष की कहानी सही मानी जाएगी जबकि वह वह भी साबित नहीं हो पाई थी।
ऽ    बरामदगियां 
मज़दूरों पर जानलेवा हमले का आरोप, और उनसे हथियारों और अन्य साक्ष्यों की बरामदगी जिस अंदाज में की गई (पेज 17-18) उससे यह बात उजागर होती है कि पुलिस द्वारा की गई जांच कैसी थी जिसके आधार पर आरोप पक्ष ने अपनी कहानी गढ़ी।
फैसले में पेश यह कहानी मानती है कि सभी 148 आरोपित ‘‘मज़दूर‘‘ घटना के बाद हथियार लेकर प्लांट से निकले और अपने अपने घर चले गए जहां उन्होंने बड़ी जाहिर सी जगहों पर हथियारों को छुपा दिया और 200 किलोमीटर दूर पुलिस ने बड़ी आसानी से घटना के 6 -7 दिन बाद उन हथियारों को उनके घरों से बरामद कर लिया।
बचाव पक्ष ने इस बाबत कई सवाल उठाए जिसका कोई जवाब अभियोग पक्ष नहीं दे पाया मसलन यह कि: 
(क) यह हथियार प्लांट के भीतर वारदात की जगह पर किस तरह लाए गए कि कोई भी इन्हें नहीं देख पाया ?
(ख) मारूति मैनेजमेंट ने मज़दूरों द्वारा इन ‘‘शॉकर‘‘ और ‘‘डोरबिमे‘‘ की ‘‘चोरी की रिपोर्ट‘‘ अक्टूबर 2012 तक क्यों नहीं लिखवाई ? 
(ग) क्या कोई साक्ष्य था कि यह वाकई मारूति कंपनी के थे और क्या उंगलियों के निशान लेने की कोशिश की गई कि किस हथियार का तथाकथित इस्तेमाल किस मज़दूर ने किया ?
यह हथियार और (कुछ मज़दूरों की) खून से सनी वर्दियां और ‘‘आइडेंटिटी कार्ड‘‘ वगैरह उनको उनके घरों से बिना किसी स्वतंत्र चश्मदीद गवाह की मौजूदगी सुनिश्चित किए बिना क्यों बरामद किए गए। (पेज 19)
आरोप पक्ष की कहानी में मौजूद ये खामियां इतनी गंभीर थी कि जज को भी इन्हे स्वीकार करना पड़ा। इसके बावजूद जज ने हमले से मज़दूरों को जोड़ने वाले साक्ष्य के अभाव को नजरअंदाज कर यह मान लिया कि हथियार, हमले और आरोपित में जुड़ाव के साक्ष्य के अभाव का यह मतलब नहीं है कि ऐसा जुड़ाव था ही नहीं (पेज 19)। 
रिपोर्ट यह भी दिखाती है की मेडिकल साक्ष्य भी आरोप पक्ष की कहानी की पुष्टि नहीं करते।(पेज 19-21) पुलिस की जांच में न तो डाक्टरों को ये हथियार दिखाए गए और न ही उनसे यह पूछा गया कि क्या अभियोग पक्ष के गवाहों को हुए जख्म इन हथियारों से हो सकते थे।सभी डॉक्टरों ने सुनवाई के दौरान यह माना की जख्म किसी सख्त या असमतल धरातल पर गिरने पर भी हो सकते थे।
आरोप पक्ष मज़दूरों के बीच ‘‘आपराधिक साजिश‘‘ या योजना या किसी ‘‘साझे इरादे‘‘ पर सहमति को भी साबित नहीं कर पाया। अभियोग पक्ष की यह नाकामी बचाव पक्ष ने साबित भी कर दिया जैसा की रिपोर्ट में बताया गया है।(पेज 21) इसके बावजूद ‘‘अपराधिक साजिश‘‘ का आरोप 13 मज़दूरों पर सही मान लिया गया और उन्हें उम्र कैद की सजा दे दी गई।
ऽ    गिरफ्तारी, जाँच और मुकदमा 
जाँच की प्रक्रिया, गिरफ्तारियों के तौर तरीके, मुकदमे की प्रकृति, जमानत पर रिहाई को नकारने और स्वीकारने में गंभीर खामियों और गड़बड़ियों पर भी रिपोर्ट में रौशनी डाली गई है। (पेज 9-12) 
इनसे पुलिस जांच का साफ साफ दुराग्रह और बेहद ताकतवर और दबंग मारुती मैनेजमेंट के साथ उसका गठजोड़ उजागर होता है।इनसे साक्ष्य और गवाहियों की प्रकृति पर भी संदेह पैदा होता है जो अभियोग पक्ष की गवाही का आधार बनी और जिन्हें फैसले में सही भी मान लिया गया।
पुलिस और मारुती प्रबंधन के इस गठजोड़ को यह रिपोर्ट (पेज 11-12) एक और मिसाल के जरिये उजागर करती है। एच आर विभाग के सहायक मैनेजर नितिन सारस्वत ने अपने दर्ज बयान में यह बताया कि उसने 19 जुलाई को 3 बजे सुबह गुड़गांव दफ्तर से नाम लेकर मज़दूरों की दो सूचियां बनाई और मानेसर के थाना प्रभारी को दी। एक सूची में 55 नाम थे और दूसरे में 89। 

जाहिर तौर पर 55 कामगारों के नाम एफ.आई.आर. में बाद में डाले गए और प्राथमिकी रिपोर्ट को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के पास भेजने में देरी की वजह शायद यही रही।
89 मज़दूरों की दूसरी सूची लेबर कांट्रेक्टर को दी गई जिन्होंने इसे 15 जुलाई को दोपहर 12ः30 बजे पुलिस दल को दिया जब उन्हें पुलिस द्वारा प्लांट में बुलाया गया। कांट्रेक्टर ने मज़दूरों की निशानदेही अक्षरमाला के क्रम में की (पेज 12) पर अदालत में उन्हीं मजदूरों को पहचान नही पाए। हालांकि पुलिस ने इन मज़दूरों को दोपहर 12ः30 बजे से पहले ही गिरफ्तार कर लिया था। यही गड़बड़ी आखिरकार, मजदूरों की रिहाई में बचाव पक्ष के काम आई।
इससे साफ पता चलता है कि कंपनी के कहे मुताबिक काम करने को पुलिस किस कदर आतुर थी। इससे यह भी साफ होता है कि प्राथमिकी रिपोर्ट में मज़दूरों के नाम कंपनी द्वारा मनमाने ढंग से डाले गए थे और उसकी वजह घटना में उनकी वास्तविक शिरकत नही थी। फिर भी इस तरह के मनगढ़ंत बयान और दस्तावेजों की बिनाह पर उन मज़दूरों को कड़ी सजा दी गई जो मुखर, सक्रिय और यूनियन के पदाधिकारी थे।
साक्ष्य गढ़ने की एक और मिसाल मिलती है हथियारों की बरामदगी की पुलिसिया कहानी से जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।
पुलिसिया कहानी में अजीब सी और अवास्तविक समानताएं है, मसलन बरामदगी के हर मामले में पुलिस कर्मियों ने कहा कि वे कपड़ों के लंबे लंबे टुकड़े अपने साथ लेकर घूम रहे थे जिसमें उन्होंने बरामद हथियार लपेटे। सभी ने यह भी कहा उन्हें बरामदगी की जगह के आस-पास ही दर्जी भी मिल गए जिन्होंने बरामद हथियारों को उन कपड़ों में रख कर सिल दिया। जाहिर है यह पुलिसिया कहानी मनगढ़ंत है (पेज 18 , बॉक्स 2 )। 
यह रिपोर्ट जांच पड़ताल की प्रक्रिया में कंपनी के पक्ष में पुलिसिया दुराग्रह की कुछ और मिसालों पर भी रौशनी डालती है। मसलन यह की आरोप पक्ष के गवाहों के बयान मारुती कंपनी द्वारा भाड़े पर दिए गए ‘‘जापानी होटल‘‘ में दर्ज किए गए और गवाहों में मज़दूरों को शामिल नहीं किया गया जबकि घटना की जगह पर सैकड़ों मज़दूर मौजूद थे (पेज 21 -24)। 
निष्कर्षः 
यह रिपोर्ट दिखलाती है की किस तरह जांच और मुकदमों में यह बात साबित नहीं हुई है की मारुती के मानेसर इकाई में 18 जुलाई 2012 को हिंसा या आगजनी के लिए कोई भी मज़दूर और खासकर दोषी करार दिए गए 31 मारुती मज़दूर, जिम्मेदार नही थे।
इसी तरह यह बात भी वाजिब संदेह से परे स्थापित नहीं हुई की अवनीश देव की हत्या के लिए कौन जिम्मेवार था।आरोपित मज़दूरों को अपराध से जोड़ने वाला कोई भी स्पष्ट साक्ष्य नहीं है फिर भी इन मज़दूरों को दोषी करार दिया गया है और कड़ी सजा दी गई है।फैसले ने कंपनी का यह मंसूबा साधने का काम किया है की सक्रिय यूनियन पदाधिकारियों और मज़दूरों को अपराधी करार देकर जेल में डालने का कोई बहाना उसे मिले।
फैसले में विभिन्न आरोपितों के लिए अलग अलग कसौटियों का इस्तेमाल किया गया है और इस तरह इंसाफ का मखौल बनाया गया है। 117 मज़दूरों को बरी करने के क्रम में जज ने अभियोग पक्ष की कथा में कई खामियां गिनाई हैं और उसने इस बात की ओर भी इशारा किया है कि साक्ष्य गढ़े भी हो सकते हैं लेकिन उसी मामले में उसी किस्म के साक्ष्यों के साथ उन्हीं कसौटियों का इस्तेमाल नहीं किया है और 31 मज़दूरों को दोषी करार दिया गया है।
मज़दूरों को दोषी साबित करने वाले अपने फैसले में जज ने, बरामदगी के तौर तरीकों, चश्मदीद गवाहों के ना होने, मज़दूरों को पुलिस द्वारा डराने-धमकाने, गिरफ्तारी और उन्हें हिरासत में यातना देने (पेज 9, पेज 19), आरोप पक्ष के गवाहों द्वारा अपने द्वारा नामित और आरोपित मज़दूरों की अदालत में सही सही निशानदेही करने में बार बार नाकाम रहने (पेज 22-23 बॉक्स 3),  जैसे तथ्यों को आड़े नहीं आने दिया।
आरोप पक्ष की कहानी में खामियों और कमियों और मारुती कंपनी और पुलिस द्वारा कानून और प्रक्रियाओं के बारंबार हनन को नजरअंदाज करने और उन्हें वाजिब ठहराने और आरोप पक्ष की कथा को मनगढ़ंत मानते हुए भी उसे स्वीकार करने में, इस फैसले ने जबरदस्त तत्परता दिखाई है। इससे पता चलता है कि न्यायपालिका ने अब निष्पक्षता का दिखावा करना भी छोड़ दिया है और पूंजी के पक्ष में खुलकर सामने आ गई है।
ज्यादातर गिरफ्तार मज़दूरों को 2 साल से ज्यादा तक जमानत नहीं देना और आरोप पक्ष की कहानी की कई बार हास्यास्पद प्रकृति और स्वांग (पेज 27) को भी न्यायपालिका द्वारा सही मान लेना दिखलाता है कि किस तरह व्यापक राजकीय मशीनरी, न्यायपालिका और कार्यपालिका पर मारुती कंपनी की जबरदस्त पकड़ है।
स्वांग और मजाक तब एक त्रासदी में बदल जाता है जब न्याय के बुनियादी सिद्वांत-अपराध को अपराधी से साक्ष्य द्वारा जोड़ना-का हनन कर, पूंजी के हित में न्यायालय सक्रिय और मुखर मज़दूरों को दोषी करार देती है।
इस तरह के पहले से तय फैसले से खतरा यह है की, एक तो इससे देश भर के मज़दूरों को यह सख्त संदेश दिया गया है कि पूंजी के हुक्मो का खामोशी से पालन करें दूसरा, इससे मज़दूरों के कानूनी हकांे का हनन करने की छूट भी पूंजी को मिल गई है।
मारुती के मज़दूरों को सबक सिखाना खास तौर पर जरुरी था क्योंकि उन्होनें कंपनी की स्थापना के समय से ही लगातार अपना संघर्ष जारी रखा हुआ था। पहले के संघर्षों में मारुती के यूनियन सदस्यों और सक्रिय मज़दूरों को निलंबन, तबादला और मुअत्तली का सामना करना पड़ा था। इस बार यूनियन में सक्रिय रहने की उन्हें सबसे भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
पीयूडीआर अपनी रिपोर्ट, ‘‘पहले से तय एक मुकदमाः मारूति मामले में 2017 के फैसले की आलोचना‘‘ पेश करता है और ऊपर चर्चित तथ्यों की रोशनी में यह मांग करता है किः
१) दोषी करार दिए मज़दूरों को तत्काल रिहा किया जाए, मामले की नए सिरे से निष्पक्ष, स्वतंत्र और उचित जांच की जाए और अदालत में इसकी दोबारा सुनवाई हो।
२) राजकीय संस्थानों और कंपनी मैनेजमेंट द्वारा यूनियन बनाने और अपनी मांग उठाने, संगठित होने के मज़दूरों के हक को मान्यता दी जाए, उसका सम्मान किया जाए और उसकी हिफाजत की जाए। 

 

शशि सक्सेना और शाहना भट्टाचार्य 
सचिव, पीयूडीआर

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