ज़िंदंगी मुहाल है! ग्रेटर नोऐडा स्थित एल.जी. इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में काम के हालात और यूनियन बनाने की कोशिश

प्रेस विज्ञप्ति - 16.11.16

एल.जी. इलैक्ट्रौनिक्स इंडिया लिमिटेड की उद्योग विहार ग्रेटर नोएडा स्थित फैक्टरी पर 11 जुलाई से 20 जुलाई 2016 तक करीब 650 मज़दूरों ने कब्ज़ा किया था। एल.जी. के मज़दूरों के परिवारों के सदस्यों और आसपास की फैक्टरियों के मज़दूर भी फैक्टरी के गेट पर मज़दूरों के समर्थन में इकट्ठा होते रहे थे। वहाँ बड़ी संख्या में पुलिस वाले और निजी सुरक्षा कर्मी तैनात कर दिए गए थे। पी.यू.डी.आर. ने इस घटना की जांच की और एक रिपोर्ट जारी की है | रिपोर्ट की कॉपी अंग्रेजी और हिंदी भाषा में इस लिंक पर http://pudr.org/year_wise/2016 उपलब्ध है | टीम द्वारा की गई जांच और निष्कर्ष संक्षिप्त में कुछ इस प्रकार है - 

1. 19 वर्षों में पहली यूनियन - 1998 में शुरू होने के बाद से अब तक 19 सालों में, इस फैक्टरी में मज़दूरों की कोई यूनियन नहीं थी। जनवरी 2016 में मज़दूरों ने ‘एल.जी. इलैक्ट्रौनिक्स एप्लायंसिस यूनियन’ नाम से यूनियन बनाने का फैसला किया। 10 अप्रैल को एल.जी. के स्थाई और ठेका मज़दूरों की एक जनरल बॉडी मीटिंग हुई, जिसमें 11 प्रतिनिधि चुने गए और यूनियन के रजिस्टर होने तक मज़दूरों की ओर से काम करने के लिए अधिकृत किये गये । 11 मई को 21 मांगों का एक मांग पत्र भी बनाया गया और मैनेजमेंट को भेजा गया। (देखें - एल.जी. पर कब्ज़ा़)

2. मैनेजमेंट द्वारा विरोध - मार्च में मैनेजमेंट ने अपने आप ही करीब 150 मज़दूरों को ’सुपरवाइज़री एलाउंस’ देना (उनका ग्रेड और बेसिक वेतन बदले बिना) शुरू कर दिया। इन में वे कुछ मज़दूर भी शामिल थे जो यूनियन के गठन की प्रक्रिया में सक्रिय थे। 11 मई को मैनेजमेंट ने मांग पत्र स्वीकार करने से भी मना कर दिया था। डी.एल.सी. के समक्ष सुनवाई के समय मैनेजमेंट ने मज़दूरों की मांगें इस आधार पर खारिज कर दीं कि जिन 5 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने मज़दूरों की ओर से मांग पत्र पर हस्ताक्षर किए वे सुपरवाइज़री (निरीक्षात्मक) ज़िम्मेदारियाँ संभाल रहे थे। इन्हें सुपरवाज़र के ग्रेड का वेतन मिल रहा था। डी.एल.सी. ने 25 जून को मैनेजमेंट के पक्ष में निर्णय दिया। और 5 जुलाई को डी.एल.सी. के आदेश के अनुसार यूनियन के रजिस्ट्रेशन के लिए दिए गए मज़दूरों के आवेदन को भी अस्वीकृत कर दिया गया। 11 जुलाई को 11 निर्वाचित यूनियन लीडरों को फैक्टरी के गेट से इस बहाने अंदर नहीं आने दिया गया कि उन्हें पदोन्नित करके सुपरवाइज़र बना दिया गया है और उनके ट्रांसफर दूसरी जगहों पर हो गए हैं। कुछ अन्य मज़दूरों को पुलिस और मैनेजमेंट द्वारा तैनात किए गए निजी सुरक्षा कर्मियों द्वारा प्रताड़ित किया गया और फैक्टरी में घुसने से रोका गया। जब फैक्टरी में घुस चुके मज़दूरों ने इसके बारे में सुना तो उन्हांने इसका विरोध किया। वे फैक्टरी के अंदर स्थित टेनिस कोर्ट में इकट्ठा हो गए और उन्होंने तय किया कि जब तक मामला सुलट नहीं जाता वे उत्पादन रोके रखेंगे। उन्होंने 10 दिनों तक टेनिस कोर्ट पर कब्ज़ा बनाए रखा। (देखें - एल.जी. पर कब्ज़ा़)

3. काम की परिस्थियाँ - पूरे विश्व में इलैक्ट्रौनिक्स के उत्पादन में, लगभग ठहरा हुआ वेतन, काम की विषम परिस्थियाँ और बढ़ती हुई गति, आम बात हो गई है। इस फैक्टरी पर हर मज़दूर, हर दिन 25-40 मिनट तक अतिरिक्त काम करता है। मज़दूरों को इस अतिरिक्त काम के लिए पैसे नहीं मिलते हैं। मज़दूरों के अनुसार, 1 मिनट में 5-6 फ्रिज असेंबल हो जाते हैं जिसका अर्थ यह है कि हर मज़दूर से प्रत्येक दिन जो 25-40 मिनट अतिरिक्त काम लिया जाता है, उस समय में ही इतने फ्रिज बन जाते हैं जिनकी बिक्री से ही सभी ‘डब्लू’ या वर्कमान श्रेणी के मज़दूरों का वेतन निकल सकता है। यानी कि, काम के नियमित समय में जो भी उत्पादन होता है, उसका मुनाफ़ा पूरी तरह से कम्पनी को जाता है। काम की गति और दबाव में वृद्धि का आकलन इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2003-05 में करीब 300 मज़दूर, हर रोज़, 1,000 इकाइयों का उत्पादन करते थे इसके मुकाबले आज यह उत्पादन बढ़कर 2,500 इकाइयाँ हो गया है परन्तु इनको बनाने वाले मज़दूरों की संख्या मात्र 180 रह गई है। (देखें - असन्तोष की सुगुगबुगुगाहट...)

4. ग्लोबल वैल्यू चेन में भारत का स्तर - इलैक्ट्रौनिक्स सामान का उत्पादन ज़्यादातर ‘ग्लोबल वैल्यू चेन‘(जी.वी.सी.) के अनुसार होता है जिसमें विभिन्न देशों में स्थापित विभिन्न फैक्ट्रियाँ उत्पादन प्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों में लगी हुई हैं। आमतौर पर विकसित देशों खासकर अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, कोरिया तथा जापान में स्थित ब्रैंड कम्पनियाँ जी.वी.सी. से उच्चतर स्तर पर होती हैं। इनको ‘लीड फर्म‘ भी कहा जाता है। इन कंपनियों के ब्रैंड होते हैं और ये कम्पनियाँ, अंतिम बाज़ार में उपभोक्ताओं, अन्य उद्योगों अथवा सरकारी ऐजेंसियों को ब्रैंडिड उत्पाद बेचती हैं। ‘लीड फर्म‘ अन्य देशों में उत्पादन के लिए स्वयं अपनी कंपनियाँ स्थापित करती है (जैसे कि एल.जी. इलैक्ट्रौनिक्स इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड) जो उनके लिए उत्पाद बनाती हैं (ऑफशोरिंग) या फिर अन्य फर्मों को उत्पादन/असेंबली का काम दे देती हैं (आउटसोंर्सिंग)। इन फर्मों को ‘कॉन्ट्रैक्ट मेन्यूफेक्चरर‘ (ठेका उत्पादक) कहा जाता हैं। इसी तर्ज़ पर एल.जी. इलैक्ट्रौनिक्स, वर्लपूल, सैमसंग जैसी लीड फर्मों ने सस्ते श्रम व बढ़ते बाज़ार का फायदा उठाने के लिए, भारत में निवेश किया है। (देखें - ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक चेन, विश्व इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार में भारत और मेक इन इण्डिया कार्यक्रम)

जांच के संदर्भ में हम मांग करते हैं कि -

1) मज़दूरों द्वारा बनाई गई यूनियन को मान्यता दी जाए और तुरंत रजिस्टर किया जाए।

2) मैनेजमेंट द्वारा मनमाने ढंग से किए गए ट्रांसफर वापस लिए जाएं।

3) मैनेजमेंट मज़दूरों द्वारा गठित यूनियन से मज़दूरों की लंबित मांगों के संबंध में बातचीत शुरू करे।

दीपिका टंडन और मॉशुमी बासु

सचिव, पी.यू.डी.आर. दिल्ली  

Section: 
Download this article here: